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कुछ पल अपनों के साथ

रोज रविबार की दोपहर को

कुछ वक़्त बिताता हूँ अपनों के साथ

अछा लगता है 😊

कुछ बातें करता हूँ, हँसता गाता हूँ

कुछ रूठे हुए को मनाता हूँ

उनका रूठना भी जाहिर ही है

हफ्तेमें एक ही तो दिन दे पाता हूँ

कुछों में फूल आ गए हैं

पतों की खुश्बू से घर महेक ने लगी हैं

बड़े हो गएँ हैं सारे

अब तो भवरें भी आने लगे हैं

जवान जो हो गए हैं यह पौधें

खुबसूरत तो थे ही हमेशा से 😊

अछा लगता है

वक़्त बिताना अपनों के साथ

चार बातें करते हैं

दो बातें वो करते हैं, दो बातें हम 😊

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